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FIFA के दमन के बावजूद ईरानी प्रशंसकों ने SoFi स्टेडियम में प्रतिबंधित शेर और सूर्य झंडे लाए

लॉस एंजिल्स के SoFi स्टेडियम में विश्व कप के मैचों के दौरान ईरानी प्रशंसकों ने एक ऐतिहासिक और भावनात्मक प्रदर्शन किया है। प्रतिबंधित शेर और सूर्य (Lion and Sun) झंडा, जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान की राष्ट्रीय पहचान था, अब विरोध और सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है। इस झंडे को विश्व मंच पर दिखाने का संकल्प ईरानी प्रवासियों और उनकी वर्तमान सरकार के बीच गहरे विभाजन को उजागर करता है।

शेर और सूर्य चिह्न की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बेहद महत्वपूर्ण है। यह प्रतीक ईरान में लगभग 2,500 वर्षों से अस्तित्व में था और मुख्य रूप से 1502 में सफाविद वंश के शासनकाल में आधिकारिक राष्ट्रीय चिह्न बना। ब्रिटेन में मैड्रिड संग्रहालय के अनुसार, 1979 की क्रांति तक यह झंडा ईरान की समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता था। आज, वर्तमान ईरानी सरकार इस चिह्न को “विभाजनकारी” मानती है और अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मैचों में इसे प्रदर्शित करने पर प्रतिबंध लगाया है।

FIFA ने मैचों में राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतीकों पर कठोर नियम लागू किए हैं। टूर्नामेंट के नियमों के अनुसार, किसी भी प्रकार के राजनीतिक संदेश वाले झंडे या बैनर स्टेडियम में ले जाना मना है। हालांकि, SoFi स्टेडियम में गवाहों ने पुष्टि की कि सुरक्षा जांच बिंदुओं पर इसे रोकना लगभग असंभव सिद्ध हो रहा है। प्रशंसकों ने झंडों को विभिन्न तरीकों से तस्करी करके स्टेडियम में लाया — कुछ ने इसे जैकेट के अंदर छुपाया, अन्य ने पर्स में रखा, और कुछ ने बच्चों के खिलौनों के साथ मिलाकर प्रवेश किया।

ईरानी प्रवासी समुदाय का आकार इस प्रदर्शन की ताकत को समझाता है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 10 लाख ईरानी-अमेरिकी रहते हैं, जिनमें से कैलिफोर्निया में सबसे बड़ी आबादी है। लॉस एंजिल्स क्षेत्र में ईरानी प्रवासियों का एक बड़ा समुदाय है, जिसे “लिटिल टेहरान” के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि SoFi स्टेडियम में ईरानी प्रशंसकों की संख्या अन्य स्थानों की तुलना में काफी अधिक रही है।

भारतीय फुटबॉल प्रशंसकों के लिए यह घटना विशेष रूप से रोचक है। भारत में फुटबॉल के प्रशंसक संस्कृति और प्रवासी समुदायों की भावनाओं को समझते हैं। Sports18 और NDTV Sports पर विश्व कप कवरेज के दौरान, टिप्पणीकारों ने ईरानी प्रशंसकों के इस प्रदर्शन पर ध्यान दिया है। भारतीय फुटबॉल फैंस मानते हैं कि खेल के मैदान से परे संदेश देना एक वैश्विक परंपरा बन गई है, जहाँ खिलाड़ी और प्रशंसक दोनों अपनी आवाज़ उठाते हैं।

इस विरोध का एक गहरा कारण हाल के ईरानी घटनाक्रम भी हैं। 2022 में महा अमिनी की मृत्यु के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने ईरानी प्रवासियों में नई जान फूंक दी है। शेर और सूर्य झंडा अब केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और स्वतंत्रता की माँग का प्रतीक बन गया है। प्रशंसकों ने स्टेडियम में जिस तरह से इसे फहराया, वह दर्शाता है कि वे अपने पूर्वजों की विरासत और भविष्य की आकांक्षाओं दोनों को एक साथ व्यक्त करना चाहते हैं।

स्टेडियम प्रशासन और FIFA अधिकारियों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। एक ओर टूर्नामेंट के नियमों का पालन करना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर प्रशंसकों की भावनाओं को दबाना अंतरराष्ट्रीय आलोचना को जन्म दे सकता है। अब तक, सुरक्षा कर्मियों ने प्रदर्शनकारियों को बाहर निकालने के बजाय चुपचाप झंडे हटाने की नीति अपनाई है।

आगे देखते हुए, यह स्पष्ट है कि ईरानी प्रशंसकों का यह अभियान केवल विश्व कप तक सीमित नहीं रहेगा। प्रवासी समुदायों ने

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