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गोल लाइन तकनीक ने जापान को तुनीशिया के खिलाफ सबसे पतले अंतर से गोल से इनकार किया

एस्तादियो मोन्टेरे के पास से गुजरती गेंद, जापान के स्ट्राइकर का दिलो-दिमाग एक साथ धड़कना, और फिर वह पल जब टेलीविजन स्क्रीन पर ‘नो गोल’ का निर्णय झलक गया। 2026 फीफा विश्व कप में तुनीशिया के खिलाफ मैच का यह क्षण फुटबॉल के इतिहास में दर्ज हो गया, जब गोल लाइन तकनीक ने जापान के दूसरे गोल को सिर्फ कुछ सेंटीमीटर की चपेट में आने से रोक दिया।

तुनीशिया के गोलकीपर एमेन दाहमेन ने वह कर दिखाया जिसे कमेंटेटरों ने “अविश्वसनीय बचाव” करार दिया। मैच की 67वें मिनट में जब जापानी खिलाड़ी ने गोल की ओर तेज प्रहार किया, दाहमेन ने अपनी पूरी ताकत और प्रतिभा एक साथ झोंक दी। गेंद उनके दस्तानों से टकराई और लगभग गोल रेखा की ओर बढ़ती गई। स्टेडियम में मौजूद हर व्यक्ति की सांस रुकी हुई थी, लेकिन गोल लाइन तकनीक ने फैसला सुना दिया – गेंद पूरी तरह गोल रेखा पार नहीं कर पाई थी।

भारतीय फुटबॉल प्रशंसकों के लिए यह घटना विशेष रूप से रोचक थी, क्योंकि दक्षिण एशियाई फुटबॉल में भी तकनीक की भूमिका बढ़ती जा रही है। स्पोर्ट्स18 और एनडीटीवी स्पोर्ट्स पर जब यह रीप्ले दिखाया गया, तो सोशल मीडिया पर “#GLT” और “#GoallineTechnology” ट्रेंड करने लगा। भारतीय कमेंटेटरों ने इसे “इतिहास का सबसे करीबी नॉन-गोल” बताया।

इस निर्णय के पीछे की तकनीक को समझना जरूरी है। गोल लाइन तकनीक (GLT) पहली बार 2014 ब्राजील विश्व कप में इस्तेमाल की गई थी, जब इंग्लैंड बनाम जर्मनी मैच में फ्रैंक लैंपार्ड का विवादित गोल नहीं देने का मामला तूल पकड़ रहा था। उस घटना ने फीफा को आगे बढ़कर तकनीक अपनाने पर मजबूर किया। 2014 में Hawk-Eye और GoalRef दोनों प्रणालियों को मान्यता दी गई। इसके बाद से यह तकनीक लगभग हर प्रमुख टूर्नामेंट में अनिवार्य हो गई है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 से 2022 तक विश्व कप में गोल लाइन तकनीक ने कुल 7 मौकों पर सही निर्णय दिया, जिसमें से 3 मामलों में गोल दर्ज हुए और 4 में गोल नहीं दर्ज हुए। इस बार 2026 विश्व कप में यह पहला स्पष्ट उदाहरण है जब तकनीक ने गोल को रोका। जापान के खिलाफ इस निर्णय की सटीकता 99.9 प्रतिशत से अधिक बताई जा रही है, जो फुटबॉल के इतिहास में अब तक का सबसे करीबी असफल गोल प्रयास है।

भारतीय फुटबॉल के संदर्भ में, एआईएफएफ ने हाल के वर्षों में आई-लीग और इंडियन सुपर लीग में भी गोल लाइन तकनीक के उपयोग पर विचार किया है। हालांकि लागत के कारण यह अभी घरेलू लीग में अनिवार्य नहीं है, लेकिन विश्व कप जैसे बड़े मंच पर इसके सटीक प्रदर्शन ने भारतीय फुटबॉल प्रशासकों के लिए भी इसे अनिवार्य करने की वकालत को मजबूत किया है।

तुनीशिया के लिए यह बचाव टूर्नामेंट की किस्मत बदलने वाला साबित हुआ। समूह सी में उन्हें पहले ही कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा था, और 0-1 से पीछे होने पर यह गोल उन्हें पूरी तरह उखाड़ फेंक सकता था। दाहमेन की इस धारा प्रवाह प्रतिक्रिया ने न केवल उनकी टीम को बचाया, बल्कि तुनीशिया को मैच में वापसी की उम्मीद भी दी। बाद के मिनटों में उन्होंने हमला करने का साहस दिखाया और अंततः मैच ड्रॉ पर रुका, जो उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी।

जापान के कोच ने मैच के बाद कहा कि वे निर्णय से निराश हैं, लेकिन तकनीक का सम्मान करते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ मीटर की दूरी से निर्णय लेना असंभव है, और यही कारण है कि आधुन

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